- नव्यवेश नवराही
सुरेश सेठ का नाम उन साहित्यकारों में शुमार है, जिन्होंने पंजाब में रहकर हिंदी साहित्य में भरपूर योगदान दिया। एक समय में उनकी रचनाएं 'सारिका’ और 'धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं में जगह पाकर खूब पढ़ी गईं। मगर पिछले कुछ समय से पंजाब के हिंदी लेखकों की कोई भी रचना मुख्यधारा के साहित्य में अपनी पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो पाई। इसके अलग कारण हैं। मगर इन कारणों की पड़ताल करना इस आलेख का उद्देश्य नहीं। इस आलेख को सुरेश सेठ के नॉवेल 'सुलगती नदी’ पर ही केंद्रित रखा जाएगा।
नॉवेल 'सुलगती नदी’ की पृष्ठभूमि पंजाब के वो काले दिन हैं, जब मानवता सरेआम लहू-लुहान हुई। पंजाब गंभीर संकट से में था। उस समय दौरान मिले जख्म अब तक रह-रहकर रिसते रहते हैं। उस संकट का असर पंजाब ही नहीं समूचे देश में महसूस किया गया। उस गमगीन माहौल ने कई रचनाकारों की संवेदना को झकझोरा। नतीजन पंजाब के काले दिनों को बयान करती कई रचनाएं अलग-अलग दृष्टिकोण से सामने आईं। इस दौर के बारे मेें पंजाबी में वरियाम सिंह संधू, प्रेम प्रकाश और फिर मनिंदर सिंह कांग की रचनाएं सशक्तता से उभकर सामने आती हैं। पर पंजाब के हिंदी साहित्य, खासकर गलप के क्षेत्र में इस संबंध में ज़्यादा कार्य नज़र नहीं आया। देर से ही सही, अब सुरेश सेठ का यह नॉवेल इस विष्य के साथ हमारे सामने है।
नॉवेल का कथ्य पंजाब के काले दिनों में हुई कुछ घटनाओं के इर्द-गिर्द बुना गया है। नॉवेल का कैनवस 1947 के देश बंटवारे से लेकर अस्सी के दशक तक फैला हुआ है। यह वो समय है, जिस दौरान देश में बड़े स्तर पर तब्दीलियां हो रही थीं। ये तब्दीलियां सियासी, सामाजिक, आर्थिक व सभ्याचारक स्तरों पर घटित हो रही थीं। इस दौरान पैदा हुई पीढ़ी के पास जहां नया समाज घढऩे के सपने थे, वहीं नया 'राजनीतिक निजाम’ स्थापित करने की बयोंतें भी थीं। अगर पंजाब के प्रसंग में देखें, तो इन तब्दीलियों ने सियासी तौर पर पंजाब की नौजवान पीढ़ी की सोच को कई खांचों में बांट दिया। नॉवेल का विष्य ऐसे ही समय के उस परिवार की कथा को बयान करता है, जिसका भूत और वर्तमान साहित्य-कला से जुड़ा हुआ है। इस परिवार के सपने निज से ऊपर उठकर समाज और कौम तक फैले हुए हैं। नॉवेल का मुख्य किरदार नवीन सिंह पंजाब में चल रहे काले तूफान को रोककर नई रौशनी फैलाना चाहता है। अपने बाबा के सपनों का नगर बसाकर वह ऐसे समाज की सर्जना करना चाहता है, जहां सब लोग कुछ सांझा उद्देश्यों को लेकर उच्च-मूल्यों की स्थापना करें व एक आदर्श जीवन जिएं। परंतु एकपक्षीय सोच वाले उसके इस सपने को साकार नहीं होने देना चाहते।
प्रगतिवादी विचारों के कारण वह अपनी मर्जीमुताबिक अपनी शादी अपने जैसे विचारों वाली लडक़ी कविता से करता है। दोनों समाज को दिशा देने के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं। अपने असूलों पर चलते हुए अंत: नवीन आतंकवादियो की गोलियों का शिकार हो जाता है। नवीन की मौत के बाद उसकी लाश पर समय के हाकिमों द्वारा राजनीति करने की कोशिश की जाती है। यहां रचनाकार ने उस समय के हाकिमों, पुलिस और तंत्र के दोहरे किरदार से भी पर्दा उठाया है।
दूसरी तरफ नवीन की पत्नी कविता नवीन की मौत के बावजूद हिम्मत नहीं हारती। वह हर हाल में नवीन के अधूरे सपने को पूरा करना चाहती है और दैनिक अ$खबार प्रकाशित करने के संकल्प पर दृढ़ रहती है। इसके लिए वह जहां समय के हाकिमों से टकराने से पीछे नहीं हटती, वहीं त्रिभुज मित्तल व पुन्नी गुरु जैसे मौकापरस्तों से भी दो-चार होती है। आदर्शवादी दृष्टिकोण से लिखे गए इस नॉवेल के अंत में इन्न-बिन नवीन जैसे विचारों वाला उसका एक पुराना दोस्त तेजपाल उसके नगर में आ जाता है और नवीन के अधूरे कार्यों को पूरा करने का प्रयत्न करता है। रचनाकार नॉवेल का अंत सुखांत परंपरा द्वारा करता हुआ यह स्थापित करता है कि रौशन विचाारों को कुछ देर के लिए दबाया तो जा सकता है, परंतु खत्म नहीं किया जा सकता। नॉवेल में आए परिवार को आसानी से पहचाना जा सकता है। नवीन, कविता और त्रिभुज मित्तल जैसे पात्रों को पंजाब के गंभीर पाठक आसानी से पहचान सकते हैं।
नॉवेल में नवीन की प्रेस के बाहर लगी लाल बत्ती एक चिह्न के रूप में उभरती है। एक दिन कोई उस बत्ती को तोड़ गया। उसकी जगह एक मनुष्य की खोपड़ी टांग गया। साथ यह सूचना चस्पा कर गया है कि एक दिन नवीन का भी यही हश्र हो सकता है। बत्ती के जलते रहने को नवीन के रौशन विचारों और रौशन सोच के साथ जोडक़र समझा सकता है। बत्ती का टूटना बताता है कि कुछ मानवता विरोधी तत्वों को यह रौशन विचार पसंद नहीं हैं। वे लोग रौशनी के इस स्रोत को समाप्त कर देना चाहते हैं।
समूचे रूप में देखें तो नॉवेल में पंजाब में एक समय दौरान हावी रहे आतंकवाद की दहशत को पेश करने की कोशिश की गई है। पर दहशत को पेश करने में लेखक पूरी तरह सफल नहीं हुआ। मुझे लगता है, लेखक अपने ही विचारों में उलझकर रह गया है। यह उलझन पूरे नॉवेल पर हावी है। मसलन, लेखक ने पंजाब में दहशत का माहौल दिखाने का प्रयास किया, पर गहराई में जाकर इसके कारणों की जांच-पड़ताल का कोई सचेत प्रयत्न नहीं किया। नॉवेलकार ने उस समय दौरान घटित अंधेरगर्दी को चित्रित किया है। पुलिस और तंत्र उस समय कैसे दोहरे किरदार के साथ लोगों के सामने था, इस बात को भी पेश किया है। सत्ता की टीसी पर बैठे लोगों और प्रशासन के साथ-साथ लेखकों तथा मीडिया की दोहरी भूमिका पर भी उंगली रखी है। तत्कालीन समय दौरान चलती लेखकों की तिकड़मबाज़ी और मौकापरस्ती को भी पुन्नी गुरू और निर्माही जैसे किरदारों के माध्यम से व्यंगात्मक जुगत से उभारने का प्रयास किया है। मगर यह तो वास्तुस्थिति का केवल चित्रण ही हुआ। यहां लेखक को कार्यों और कारणों की गहराई में जाकर पाठक को सोचने के लिए मजबूर करना चाहिए था। यानी पंजाब के दहशत के दिनों की तस्वीर को इन्न-बिन पेश करने के बजाय आतंकवाद के कारणों की गहराई से पड़ताल करने का सचेत प्रयत्न करना चाहिए था।
नॉवेल का वृतांत लकीरी ना होकर अतीत व वर्तमान की उठापटक द्वारा आगे बढ़ता है। पर इस सबके बावजूद नॉवेल में सबसे बड़ी जो बात मुझे खटकी है और जो इस रचना की सबसे बड़ी कमज़ोरी कही जा सकती है, वो यह है कि नॉवेल में समय और सथान की एकता को बिल्कुल अनदेखा किया गया है। नॉवेल में एक घटना कब शुरू होती है और कब समाप्त, समझने के लिए का$फी दिमाग खपाना पड़ता है। यह भी नहीं कि नॉवेल एबसर्ड शैली में है। आसान वृतांतक शैली में लिखे होने के बावजूद रचना में यह कमी लगातार खटकती है। ऐसी कमी की आशा सेठ जैसे परिपक्व लेखक से नहीं की जा सकती। लेखक एक ही कांड में कई कालखंडों का जि़क्र कर रहा है। चल रहे कांड में बिना पैराग्राफ बदले एकदम समय और स्थान कब बदल जाते हैं, पता नहीं चलता। यह खामी पाठकीय तंद्रा को ना केवल भंग करती है, बल्कि उलझाती भी है। पूरे नॉवेल में समय की चाल पहचाननी बड़ी मुश्किल है। नॉवेल की यह खामी रौचकता को भी भंग कर रही है।
नॉवेल में और भी कई तकनीकी खामियां हैं, जिनमें से कुछ का जि़क्र करना ज़रूरी है। नॉवेल की शुरुआत पंजाब के काले दिनों से होती है, जब नवीन और कविता अपनी पत्रिका के बारे में बातें करते हैं। नवीन शहर से अपनी पत्रिका के नए अंक के बंडल लेकर आता है। इस समय उनकी शादी को लगभग पांच साल हो चुके हैं और उनका चार साल का एक बच्चा सुकांत भी है।
परंतु, नॉवेल के कांड नंबर 5 में लेखक जब नवीन के दोस्त तेजपाल को फलैशबैक विधि द्वारा बचपन की यादों में लेजाता है, तो देश के आज़ाद होने का जि़क्र करता है। हालांकि इस समय मुख्य पात्र और तेजपाल नए-नए स्कूल में दाखिल होते हैं। लेखक बयान करता है कि वे इकट्ठे घूमते हैं और यह बात करते हैं कि देश आज़ाद हो गया है। पंडित नेहरू बापू के सपनों का भारत बना रहे हैं। इसका मतलब, यह बात 1947, 48 या ज़्यादा से ज़्यादा 49 की मान लेनी चाहिए। यानी उस समय उनकी उम्र भी 12 से 15 साल के बीच होगी। बारह साल की उम्र अनुसार हिसाब लगाया जाए, तो नवीन और उसके दोस्त का जन्म 1935-36 के आसपास हुआ बनता है। अगर यह सही मान लिया जाए, तो आतंकवाद के दिनों दौरान नवीन की उम्र 40 साल से ज़्यादा बनती है। यानी उसने चालीस साल से ज़्यादा की उम्र में शादी करवाई। जब वह कविता से शादी करवाता है, तो कविता कॉलेज में पढ़ती दिखाई गई है। यानी उसकी उम्र 20 से 25 साल तक होगी। यहां दोनों की उम्र का तालमेल समझ से परे है। इस बारे में लेखक ने कहीं स्पष्ट भी नहीं किया।
खैर, लेखक ने तेजपाल के दुबई जाने के वृतांत में भी इसी तरह की खामी रहने दी है। कांड से यह स्पष्ट नहीं होता कि तेजपाल कब दुबई गया, कितनी देर वहां रहा और कब वापस आ गया! वृतांत के अनुसार तेजपाल दुबई के लिए रवाना होता है और स्टीमर पर छापा पड़ जाता है। उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है। फिर यह पता नहीं चलता कि वह कितनी देर हवालात में रहा? जब उसके देश लौटने का जि़क्र आता है, तो उसे पंजाब के काले दिनों के समय में दिखाया जाता है।
वृतांतक रचना ठहराव की मांग करती है, पर लगता है एक बार लिखने के बाद रचनाकार ने इसे दोबारा नहीं पढ़ा। इसका प्रमाण नॉवेल में एक बड़ी तथ्यात्मक $गलती के रूप में देखा जा सकता है। नॉवेलकार ने पंजाब के जिस परिवार के सदस्य को मुख्य पात्र के रूप में नॉवेल के केंद्र में रखा है, उसके वास्तविक नाम 'सुमित’ का जि़क्र भी नॉवेल के पृष्ठ नंबर 31 और 53 पर कर दिया है। मैंने पहले भी जि़क्र किया है कि ज़्यादातर पाठक इस किरदार को अच्छी तरह पहचानते हैं।
नॉवेल की पृष्ठभूमि में जिस दहशत को उभारने की कोशिश की गई है, वह पहले दो कांडों के बाद कहीं नज़र नहीं आती। जबकि चाहिए यह था कि यह दहशत नॉवेल के अंतिम कांड तक पाठक महसूस करता रहता। एक अच्छी वृतांतक रचना वही होती है, जो अपनी शुरुआत से ही पाठक को अपने साथ चलाती जाए। इस तत्व की कमी भी इस रचना में बड़े स्तर पर महसूस होती है। लेखक पात्रों का चरित्र चित्रण भी उतनी गहराई से नहीं कर पाया, जितनी इस नॉवेल की मांग थी। संवाद बिल्कुल सपाट हैं।
जिस विष्य को लेकर नॉवेल लिखा गया है, उसके मुताबिक यह नॉवेल बड़ी और शक्तिशाली रचना बन सकता था। यदि नॉवेल उस समय आता, जब पंजाब काले दिनों को भोग रहा था या इस संताप से उभरा था, तो इसकी प्रासंगिकता बढ़ जाती। यह रचना घटनाक्रम के इतने वर्षों बाद आई है, तो इस पर बारीकी से काम किया जाना चाहिए था। ऐसे में रचना का साहित्यिक महत्व भी बढ़ता और इसे एक दस्तावेज़ के रूप में संभाला भी जाता।
नव्यवेश नवराही युवा कवि व पत्रकार हैं। पंजाबी में साहित्यिक विषयों पर कई आलेख प्रकाशित। पंजाबी, हिंदी और उर्दू से परस्पर कई रचनाओं का अनुवाद। वर्तमान में राजस्थान पत्रिका, नोएडा से संबद्ध। संपर्क - navrahi@gmail.com
सुरेश सेठ का नाम उन साहित्यकारों में शुमार है, जिन्होंने पंजाब में रहकर हिंदी साहित्य में भरपूर योगदान दिया। एक समय में उनकी रचनाएं 'सारिका’ और 'धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं में जगह पाकर खूब पढ़ी गईं। मगर पिछले कुछ समय से पंजाब के हिंदी लेखकों की कोई भी रचना मुख्यधारा के साहित्य में अपनी पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो पाई। इसके अलग कारण हैं। मगर इन कारणों की पड़ताल करना इस आलेख का उद्देश्य नहीं। इस आलेख को सुरेश सेठ के नॉवेल 'सुलगती नदी’ पर ही केंद्रित रखा जाएगा।
नॉवेल 'सुलगती नदी’ की पृष्ठभूमि पंजाब के वो काले दिन हैं, जब मानवता सरेआम लहू-लुहान हुई। पंजाब गंभीर संकट से में था। उस समय दौरान मिले जख्म अब तक रह-रहकर रिसते रहते हैं। उस संकट का असर पंजाब ही नहीं समूचे देश में महसूस किया गया। उस गमगीन माहौल ने कई रचनाकारों की संवेदना को झकझोरा। नतीजन पंजाब के काले दिनों को बयान करती कई रचनाएं अलग-अलग दृष्टिकोण से सामने आईं। इस दौर के बारे मेें पंजाबी में वरियाम सिंह संधू, प्रेम प्रकाश और फिर मनिंदर सिंह कांग की रचनाएं सशक्तता से उभकर सामने आती हैं। पर पंजाब के हिंदी साहित्य, खासकर गलप के क्षेत्र में इस संबंध में ज़्यादा कार्य नज़र नहीं आया। देर से ही सही, अब सुरेश सेठ का यह नॉवेल इस विष्य के साथ हमारे सामने है।
नॉवेल का कथ्य पंजाब के काले दिनों में हुई कुछ घटनाओं के इर्द-गिर्द बुना गया है। नॉवेल का कैनवस 1947 के देश बंटवारे से लेकर अस्सी के दशक तक फैला हुआ है। यह वो समय है, जिस दौरान देश में बड़े स्तर पर तब्दीलियां हो रही थीं। ये तब्दीलियां सियासी, सामाजिक, आर्थिक व सभ्याचारक स्तरों पर घटित हो रही थीं। इस दौरान पैदा हुई पीढ़ी के पास जहां नया समाज घढऩे के सपने थे, वहीं नया 'राजनीतिक निजाम’ स्थापित करने की बयोंतें भी थीं। अगर पंजाब के प्रसंग में देखें, तो इन तब्दीलियों ने सियासी तौर पर पंजाब की नौजवान पीढ़ी की सोच को कई खांचों में बांट दिया। नॉवेल का विष्य ऐसे ही समय के उस परिवार की कथा को बयान करता है, जिसका भूत और वर्तमान साहित्य-कला से जुड़ा हुआ है। इस परिवार के सपने निज से ऊपर उठकर समाज और कौम तक फैले हुए हैं। नॉवेल का मुख्य किरदार नवीन सिंह पंजाब में चल रहे काले तूफान को रोककर नई रौशनी फैलाना चाहता है। अपने बाबा के सपनों का नगर बसाकर वह ऐसे समाज की सर्जना करना चाहता है, जहां सब लोग कुछ सांझा उद्देश्यों को लेकर उच्च-मूल्यों की स्थापना करें व एक आदर्श जीवन जिएं। परंतु एकपक्षीय सोच वाले उसके इस सपने को साकार नहीं होने देना चाहते।
प्रगतिवादी विचारों के कारण वह अपनी मर्जीमुताबिक अपनी शादी अपने जैसे विचारों वाली लडक़ी कविता से करता है। दोनों समाज को दिशा देने के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं। अपने असूलों पर चलते हुए अंत: नवीन आतंकवादियो की गोलियों का शिकार हो जाता है। नवीन की मौत के बाद उसकी लाश पर समय के हाकिमों द्वारा राजनीति करने की कोशिश की जाती है। यहां रचनाकार ने उस समय के हाकिमों, पुलिस और तंत्र के दोहरे किरदार से भी पर्दा उठाया है।
दूसरी तरफ नवीन की पत्नी कविता नवीन की मौत के बावजूद हिम्मत नहीं हारती। वह हर हाल में नवीन के अधूरे सपने को पूरा करना चाहती है और दैनिक अ$खबार प्रकाशित करने के संकल्प पर दृढ़ रहती है। इसके लिए वह जहां समय के हाकिमों से टकराने से पीछे नहीं हटती, वहीं त्रिभुज मित्तल व पुन्नी गुरु जैसे मौकापरस्तों से भी दो-चार होती है। आदर्शवादी दृष्टिकोण से लिखे गए इस नॉवेल के अंत में इन्न-बिन नवीन जैसे विचारों वाला उसका एक पुराना दोस्त तेजपाल उसके नगर में आ जाता है और नवीन के अधूरे कार्यों को पूरा करने का प्रयत्न करता है। रचनाकार नॉवेल का अंत सुखांत परंपरा द्वारा करता हुआ यह स्थापित करता है कि रौशन विचाारों को कुछ देर के लिए दबाया तो जा सकता है, परंतु खत्म नहीं किया जा सकता। नॉवेल में आए परिवार को आसानी से पहचाना जा सकता है। नवीन, कविता और त्रिभुज मित्तल जैसे पात्रों को पंजाब के गंभीर पाठक आसानी से पहचान सकते हैं।
नॉवेल में नवीन की प्रेस के बाहर लगी लाल बत्ती एक चिह्न के रूप में उभरती है। एक दिन कोई उस बत्ती को तोड़ गया। उसकी जगह एक मनुष्य की खोपड़ी टांग गया। साथ यह सूचना चस्पा कर गया है कि एक दिन नवीन का भी यही हश्र हो सकता है। बत्ती के जलते रहने को नवीन के रौशन विचारों और रौशन सोच के साथ जोडक़र समझा सकता है। बत्ती का टूटना बताता है कि कुछ मानवता विरोधी तत्वों को यह रौशन विचार पसंद नहीं हैं। वे लोग रौशनी के इस स्रोत को समाप्त कर देना चाहते हैं।
समूचे रूप में देखें तो नॉवेल में पंजाब में एक समय दौरान हावी रहे आतंकवाद की दहशत को पेश करने की कोशिश की गई है। पर दहशत को पेश करने में लेखक पूरी तरह सफल नहीं हुआ। मुझे लगता है, लेखक अपने ही विचारों में उलझकर रह गया है। यह उलझन पूरे नॉवेल पर हावी है। मसलन, लेखक ने पंजाब में दहशत का माहौल दिखाने का प्रयास किया, पर गहराई में जाकर इसके कारणों की जांच-पड़ताल का कोई सचेत प्रयत्न नहीं किया। नॉवेलकार ने उस समय दौरान घटित अंधेरगर्दी को चित्रित किया है। पुलिस और तंत्र उस समय कैसे दोहरे किरदार के साथ लोगों के सामने था, इस बात को भी पेश किया है। सत्ता की टीसी पर बैठे लोगों और प्रशासन के साथ-साथ लेखकों तथा मीडिया की दोहरी भूमिका पर भी उंगली रखी है। तत्कालीन समय दौरान चलती लेखकों की तिकड़मबाज़ी और मौकापरस्ती को भी पुन्नी गुरू और निर्माही जैसे किरदारों के माध्यम से व्यंगात्मक जुगत से उभारने का प्रयास किया है। मगर यह तो वास्तुस्थिति का केवल चित्रण ही हुआ। यहां लेखक को कार्यों और कारणों की गहराई में जाकर पाठक को सोचने के लिए मजबूर करना चाहिए था। यानी पंजाब के दहशत के दिनों की तस्वीर को इन्न-बिन पेश करने के बजाय आतंकवाद के कारणों की गहराई से पड़ताल करने का सचेत प्रयत्न करना चाहिए था।
नॉवेल का वृतांत लकीरी ना होकर अतीत व वर्तमान की उठापटक द्वारा आगे बढ़ता है। पर इस सबके बावजूद नॉवेल में सबसे बड़ी जो बात मुझे खटकी है और जो इस रचना की सबसे बड़ी कमज़ोरी कही जा सकती है, वो यह है कि नॉवेल में समय और सथान की एकता को बिल्कुल अनदेखा किया गया है। नॉवेल में एक घटना कब शुरू होती है और कब समाप्त, समझने के लिए का$फी दिमाग खपाना पड़ता है। यह भी नहीं कि नॉवेल एबसर्ड शैली में है। आसान वृतांतक शैली में लिखे होने के बावजूद रचना में यह कमी लगातार खटकती है। ऐसी कमी की आशा सेठ जैसे परिपक्व लेखक से नहीं की जा सकती। लेखक एक ही कांड में कई कालखंडों का जि़क्र कर रहा है। चल रहे कांड में बिना पैराग्राफ बदले एकदम समय और स्थान कब बदल जाते हैं, पता नहीं चलता। यह खामी पाठकीय तंद्रा को ना केवल भंग करती है, बल्कि उलझाती भी है। पूरे नॉवेल में समय की चाल पहचाननी बड़ी मुश्किल है। नॉवेल की यह खामी रौचकता को भी भंग कर रही है।
नॉवेल में और भी कई तकनीकी खामियां हैं, जिनमें से कुछ का जि़क्र करना ज़रूरी है। नॉवेल की शुरुआत पंजाब के काले दिनों से होती है, जब नवीन और कविता अपनी पत्रिका के बारे में बातें करते हैं। नवीन शहर से अपनी पत्रिका के नए अंक के बंडल लेकर आता है। इस समय उनकी शादी को लगभग पांच साल हो चुके हैं और उनका चार साल का एक बच्चा सुकांत भी है।
परंतु, नॉवेल के कांड नंबर 5 में लेखक जब नवीन के दोस्त तेजपाल को फलैशबैक विधि द्वारा बचपन की यादों में लेजाता है, तो देश के आज़ाद होने का जि़क्र करता है। हालांकि इस समय मुख्य पात्र और तेजपाल नए-नए स्कूल में दाखिल होते हैं। लेखक बयान करता है कि वे इकट्ठे घूमते हैं और यह बात करते हैं कि देश आज़ाद हो गया है। पंडित नेहरू बापू के सपनों का भारत बना रहे हैं। इसका मतलब, यह बात 1947, 48 या ज़्यादा से ज़्यादा 49 की मान लेनी चाहिए। यानी उस समय उनकी उम्र भी 12 से 15 साल के बीच होगी। बारह साल की उम्र अनुसार हिसाब लगाया जाए, तो नवीन और उसके दोस्त का जन्म 1935-36 के आसपास हुआ बनता है। अगर यह सही मान लिया जाए, तो आतंकवाद के दिनों दौरान नवीन की उम्र 40 साल से ज़्यादा बनती है। यानी उसने चालीस साल से ज़्यादा की उम्र में शादी करवाई। जब वह कविता से शादी करवाता है, तो कविता कॉलेज में पढ़ती दिखाई गई है। यानी उसकी उम्र 20 से 25 साल तक होगी। यहां दोनों की उम्र का तालमेल समझ से परे है। इस बारे में लेखक ने कहीं स्पष्ट भी नहीं किया।
खैर, लेखक ने तेजपाल के दुबई जाने के वृतांत में भी इसी तरह की खामी रहने दी है। कांड से यह स्पष्ट नहीं होता कि तेजपाल कब दुबई गया, कितनी देर वहां रहा और कब वापस आ गया! वृतांत के अनुसार तेजपाल दुबई के लिए रवाना होता है और स्टीमर पर छापा पड़ जाता है। उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है। फिर यह पता नहीं चलता कि वह कितनी देर हवालात में रहा? जब उसके देश लौटने का जि़क्र आता है, तो उसे पंजाब के काले दिनों के समय में दिखाया जाता है।
वृतांतक रचना ठहराव की मांग करती है, पर लगता है एक बार लिखने के बाद रचनाकार ने इसे दोबारा नहीं पढ़ा। इसका प्रमाण नॉवेल में एक बड़ी तथ्यात्मक $गलती के रूप में देखा जा सकता है। नॉवेलकार ने पंजाब के जिस परिवार के सदस्य को मुख्य पात्र के रूप में नॉवेल के केंद्र में रखा है, उसके वास्तविक नाम 'सुमित’ का जि़क्र भी नॉवेल के पृष्ठ नंबर 31 और 53 पर कर दिया है। मैंने पहले भी जि़क्र किया है कि ज़्यादातर पाठक इस किरदार को अच्छी तरह पहचानते हैं।
नॉवेल की पृष्ठभूमि में जिस दहशत को उभारने की कोशिश की गई है, वह पहले दो कांडों के बाद कहीं नज़र नहीं आती। जबकि चाहिए यह था कि यह दहशत नॉवेल के अंतिम कांड तक पाठक महसूस करता रहता। एक अच्छी वृतांतक रचना वही होती है, जो अपनी शुरुआत से ही पाठक को अपने साथ चलाती जाए। इस तत्व की कमी भी इस रचना में बड़े स्तर पर महसूस होती है। लेखक पात्रों का चरित्र चित्रण भी उतनी गहराई से नहीं कर पाया, जितनी इस नॉवेल की मांग थी। संवाद बिल्कुल सपाट हैं।
जिस विष्य को लेकर नॉवेल लिखा गया है, उसके मुताबिक यह नॉवेल बड़ी और शक्तिशाली रचना बन सकता था। यदि नॉवेल उस समय आता, जब पंजाब काले दिनों को भोग रहा था या इस संताप से उभरा था, तो इसकी प्रासंगिकता बढ़ जाती। यह रचना घटनाक्रम के इतने वर्षों बाद आई है, तो इस पर बारीकी से काम किया जाना चाहिए था। ऐसे में रचना का साहित्यिक महत्व भी बढ़ता और इसे एक दस्तावेज़ के रूप में संभाला भी जाता।
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| एन नवराही/N Navrahi |
नव्यवेश नवराही युवा कवि व पत्रकार हैं। पंजाबी में साहित्यिक विषयों पर कई आलेख प्रकाशित। पंजाबी, हिंदी और उर्दू से परस्पर कई रचनाओं का अनुवाद। वर्तमान में राजस्थान पत्रिका, नोएडा से संबद्ध। संपर्क - navrahi@gmail.com


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